जो नहीं है

जो नहीं है जिसके पास

उसे वही यहाँ बाँटते देखा

नफ़रत से भरे हैं जो

प्यार का सबक़ उन्हे बाँचते देखा

बच्चे की भूख न दिखी जिन्हें 

पतथर को दूध उन्हे पिलाते देखा

इंसान का ख़ून बहाके यहाँ 

खुदा को अजान लगाते देखा 

हवस का शिकार करके नारी का

शील का सबक़ उसे सिखाते देखा

उपेक्षित कर तमाम उमर उसके जज़्बात 

अर्द्धांगिनी उसे फिर बताते देखा

बचपन सयाना कर बोझ से

मासूमियत बच्चों में ढूँढते देखा

पहुँच न सके जिस मँजिल पे कभी

संतान को उसी राह पे धकेलते देखा

धर न पाये जिन मूल्यों को जीवन मे कभी

नयी पीढ़ी को गुण वही फिर समझाते देखा

घोल के जहर तमाम फ़िज़ा में

फ़िकर जहाँ की फिर करते 

बिखरे काग़ज़ पे कूँचियाँ ,कलर ट्यूब 

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे 

मेरे बच्चों ने खयालों को अपने कुछ रंगो से भरा है

चादर की सिलवटों पे औंधे पड़े तकिये

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे

मेरे बच्चों ने रात को अपने कुछ ख़्वाबों से छुआ है

बेतरतीब रखी किताबों से झाँकते बुकमार्क 

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते है यह मुझसे

मेरे बच्चों ने दुनिया को अपने कुछ सवालों से टटोला है

पसीने से भीगे कपड़े , गर्द मे लिपटे जूते

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते है यह मुझसे 

मेरे बच्चों ने माटी को अपने कुछ खेलों से छुआ है

दिवार से टिका गिटार, कोने में रखा पयानो

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे

मेरे बच्चों ने हवा को अपने कुछ सुरों से सुना है

छेदों से भरे यहाँ वहाँ से झाँकते टारगेट पेपर

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे

मेरे बच्चों नें ध्यान से अपने कुछ लक्ष्यों को भेदा है

मर्तबान के अधखुले ढक्कन , झूठे बर्तन 

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे

मेरे बच्चों ने भूख को अपने कुछ स्वाद से चखा है

बिखरा घर, खुल-बंद का शोर करते दरवाज़े 

अच्छे लगते है मुझे

कहते है यह मुझसे

मेरे बच्चों ने जीवन को अपने कुछ अंदाज से जिया है

एक दिन न शोर होगा न फैला सामान होगा

अच्छा लगेगा मुझे तब भी

कहेगा मौन घर तब मुझसे 

मेरे बच्चों ने आसमां को अपने कुछ हौसलों की परवाज़ से चूमा है

समेट लूँगी यह सामान घर की ख़ामोशी में

सजा दूँगी दिवारों को यादों से

पर तब तक यूँ ही उथल पथल सी रहने दो

मेरे बच्चों का बचपन यूँ फैला सा अच्छा लगता है मुझे

आज का सच

कभी साड़ी से धर्म टूटता

कभी स्कर्ट से लूटती सभ्यता 

नारी के कपड़ों में लिपटी है

हाय! मेरे समाज की संकीर्णता 

कहीं केसरिया कोसा जाता 

कहीं हरे का होता अपमान

रंगो में देखो बँट गयी है

हाय! मेरे देशवासियों की पहचान

कभी शुकर से अपमानित होती क़ुरान 

कभी गौरक्षा हेतु क़त्ल होते इंसान

मासूम पशुओं के माथे मढ़ दिये

हाय! मेरे क़ातिलों ने इलजाम

कहीं रात भर जगाये जागरण

कहीं सुबह की नींद उड़ाये अजान

दिन रात शोर से भर दिये

हाय! कितने बहरे हुये मेरे भगवान 

अल्लाह ईश्वर या भगवान

सुनो ! जिस नाम से भी तुम सुनते हो

तुम्हारी रक्षा करते करते 

हाय! राक्षस बन गया यहाँ इंसान 

यूँ तो 

यूँ तो तेरे बिन भी मुकम्मल हूँ मैं

यूँ तो मेरी भी तुझे ज़रूरत नहीं

पर कहता है आज भी कमबख़्त दिल

‘हम’ में जो बात थी

वह न तुझ में है और न मुझ में

यूँ तो मंजिले है मेरी तुझसे जुदा भी

यूँ तो हमसफ़र है तेरे मेरे सिवा भी

पर कहती हैं आज भी कमबख़्त राहें

सफर मे जिदगी थी

जब ‘हम’ साथ चले थे

यूँ तो इनकार है मेरे लबों पे

यूँ तो खामोश तेरी जुँबा भी है

पर कहती है आज भी कमबख़्त नज़र 

क़िस्मत मे लिखा इशक था

तभी ‘हम’ मिले थे

कैसे कह दूँ

माना बरसो से तुम साथ हो मेरे
न मेरी राहों पे तुम्हारे क़दमों के निशाँ हैं

न मेरी मँजिलों का पता है तुम्हें

कैसे कह दूँ जान! मैं हमसफर तुम्हें

माना बरसों से रखते हो तुम ख़याल मेरा

न मेरे जज़्बातों की है ख़बर तुम्हें

न मेरे लफजों की है क़दर तुम्हें

कैसे कह दूँ जान !मैं हमनवां तुम्हें

माना बरसो से रिश्ता है तुम्हारा मेरा

न मेरी मुस्कराहट में खिलखिलाते हो

न मेरे अश्क़ अपने काँधे पे सजाते हो

कैसे कह दूँ जान! मैं हमनशीन तुम्हें

माना बरसों से मुझमें बसा घर है तुम्हारा

न मेरी दिवारों पे यादें सजाते हो

न मेरे आँगन में रजनीगंधा महकाते हो

कैसे कह दूँ जान! मैं हमनफस तुम्हें

   नहीं चाहती

                       
नहीं चाहती कि मेरी मेहफूजगी की ख़ातिर
             तुम्हारे क़दम आगे हो और मेरे पीछे

मुश्किल रास्तों पे तुम्हारे हमकदम चल सकती हूँ मैं

              साथ तुम्हारे हर मुश्किल से लड़ सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि मेरी हिफ़ाज़त की ख़ातिर

               अपना कोट उतार के पहना दो मुझे

सर्दी को एक कोट में तुमसे आधा बाँट सकती हूँ मैं

               साथ तुम्हारे हर मौसम को जी सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि मेरे आराम की ख़ातिर

         बोझ भारी तुम अपने काँधो पे उठा लो

तुम्हारे हर भार को आधा बाँट सकती हूँ मैं

       साथ तुम्हारे हर बोझ को हल्का कर सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि मेरी ज़िम्मेदारी उठाने की ख़ातिर

          बुरे वक़्त में तुम मेरी ढाल बनो

 तुम्हारे हाथ की शमशीर बन सकती हूँ मैं

          साथ तुम्हारे हर दुश्मन से लड़ सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि मेरी सलामती की ख़ातिर

       मुझे घर में कैद कर पासबान तुम बन जाओ

तुम्हारी ग़ैरमौजूदगी में भी तुम्हारी बन रह सकती हूँ मैं

       साथ हो न हो तुम, बुरी नज़र पढ़ सँभल सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि तुमसे मदद पाने की ख़ातिर

        नज़र नीची रख मैं छुई मुई सी ख़ुद को जताउँ

तुमसे कमतर बन कर मैं तुम्हारी अना बहलाऊँ

    साथ मुक़ाबला नहीं तुम्हारे, पर बराबर बन सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि रोमांस के ख़ुशगवार एहसास के ख़ातिर

         चंद रोज़ तुम मेरी ज़ुल्फ़ सँवारो, महुबबत गुनगुनाओ

मेरे लिए चंद दरवाज़े खोलो कुछ कुर्सी सरकाओ

        साथ दो उमर भर हमसफर बना बस यही चाहती हूँ मैं

-शालिनी सिंह

सड़क का गुंडा 

निर्भया का बलात्कारी लगता ‘मासूम’ है

तेज़ाब से जला दे ‘ना’ को वह ‘मर्द  ‘ है

बेटी पे कसता फबतियाँ वह ‘रोमियो’ है

पत्नी का हत्यारा पति भी रहता ‘निर्दोष’ है

पतथर फेंके वर्दी पे वह ‘हमवतन’  है

भड़का कर दंगा भी कोई ‘हमदर्द’ है

आग लगा दे शहर को वह ‘मजबूर’ है

लूटकर ख़ज़ाना कहलाता ‘बेक़सूर’ है

शंका पर करे हाहाकार वह ‘गौरक्षक’ है

नफ़रत का दे सबक़ फिर भी ‘राम भक्त ‘ है

दौलत लूटा बदलवाये धर्म वह ‘पादरी’ है

बेतुके फ़तवे सुनाये कहलाता पर ‘मौलवी’ है

झंडे फहराये दुश्मन के वह ‘विद्यार्थी’ है

नक्सलियों की पीठ ठोकें वह ‘बुद्धिजीवी’ है

नशे में रौंद दे ग़रीबों को वह ‘चहेता सितारा’ है

रिहा करा दे क़ातिल को यह ‘पेशेवर वक़ील’ है

क़त्ल कर दे इंसानियत वह ‘जिहादी’ है

प्रहार करे देश पे वह ‘प्यारा पड़ोसी ‘ है

गाली देना देश को ‘वैचारिक अभिव्यक्ती ‘ है

सच की तस्वीर  बदलना ‘स्वतंत्रता प्रेस’ की है

जनता को गुमराह करना सिर्फ़ ‘राजनीति’ है

भ्रष्टाचार का दलदल कहलाती ‘नौकरशाही’ है

बस………

तिरंगे में लिपटा घर आया वह एक ‘मामूली सिपाही’ है

‘सड़क के गुण्डे ‘ की उपाधि रक्षको के सरगने ने पायी है