आज़ाद 

तुमने जो जिस्म पे मेरे दिया
हर जखम भर के कवच मेरा बन गया

टुटी हड्डियाँ जुड़ी जब मेरी
मन कुछ और मेरा तब तन गया

हर नील जिससे सजाया था तुमने मुझे
देखो फीका पड़ ठोस मुझे कर गया

आँसू का हर क़तरा बहा जो आँख से
सुख कर वह खारा मुझे कर गया

रूह पे पड़े घाव हरे हैं अभी
वक़्त मरहम लगायेगा इन पे भी कभी

भूल कर भी अब मुझे तुम न छुना
छोड़ घर तुम्हारा नया आसमां मैंने चुना

आजाद हूँ मैं तुम्हारे हर शोषण से
ख़त्म मैंने रोज की जंग को किया
-मेजर (डा) शालिनी सिंह
Inspired by and dedicated to a special friend who survived domestic violence and became a truly empowered woman!

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शाख़ से गिरे पत्ते 

शाख़ से गिरे पत्तों पर
क़दम रखना संभाल के

हरी छाँव का सहारा दिया था

चिलचिलाती धूप में कभी

लड़खड़ाते क़दमों के

पीछे चलना इत्मिनान से

गोद में इनके घूमते थे

पैरों से चल न पाते थे कभी

मंद आवाज को इनकी

हौले हौले ही समझना

इशारे तुम्हारे समझते थे

जुबा से न बोल पाते थे कभी

धूमिल आँखों में पढ़ना

तजुरबा जिंदगी का

वक़्त लिख रहा था इनकी किताब

हर्फ़ भी न थे तुम कभी

रिश्तों को तौलना पर

बीते कल की कसौटी पे

कल काम आये थे बहुत

तुमहे इनकी ज़रूरत थी कभी

-मेजर (डा) शालिनी सिंह

कुछ यूँ

बरसों का भरोसा पल में गुनाह हुआ 

मेरा महुबबत पे ग़ुरूर कुछ यूँ कम हुआ

हवा भी शर्मिंदा थी चिराग़ों को बुझाकर

अंधेरों का आंतक कुछ यूँ सरेआम हुआ

 हाथो में छिपा पिंजरा देता आज़ादी की दुहाई

सैयाद के हाथ पंछी कुछ यूँ कैद हुआ

अश्क़ पीते पीते समुंदर हम बन गये

जिंदगी में हादसा कुछ यूँ गहरा हुआ

दरखत पे आरी चलाई कड़ी धूप मे उसने

हरी छाँव में कातिल कुछ यूँ चुस्त हुआ

करवटें बदलते रहे हम नींद से रूठकर

ख़्वाबों में उनसे मिलना कुछ यूँ बंद हुआ

मोहब्बत भूला नहीं और नफरत कर बैठा

इशक में उसके है दिल मेरा कुछ यूँ उलझा हुआ

चीख़ती रही रूह पर ज़रा न आवाज हुयी

मेरे लबों पे तेरा नाम कुछ यूँ खामोश हुआ

मायूसी पे लगाते रहे नयी उम्मीद का मलहम 

जिंदगी मे दर्द का काँरवा कुछ यूँ तैयार हुआ

उसकी यादें लिख जाती हैं जखम कोई 

शायरों में मेरा नाम कुछ यूँ शुमार हुआ

-मेजर (डा) शालिनी सिंह

आस्था 

तुझपे है विश्वास कम
पाखंड पे आस्था ज़्यादा कयूँ है ?

हे भगवान ! तेरा भक्त इतना नादां कयूँ है ?

मनोरंजन को पूजा कहता 
त्योहार को धर्म समझता कयूँ है ?

हे भगवान! तेरा भक्त इतना नादां कयूँ है ?

ख़ुद को न उठा सका इंच भर भी
तुझे अपनी गर्त में गिराता कयूँ है ?

हे भगवान! तेरा भक्त इतना नादां कयूँ है ?

हर्फ़ न सीखा एक मुहबबत का
पंडित, मौलवी और पादरी कहलाता कयूँ है ?

हे भगवान! तेरा भक्त इतना नादां कयूँ है ?

अंधा हो चल देता है किसी के भी पीछे
तेरा नाम ढोंगीयों के सिर सजाता कयूँ है ?

हे भगवान! तेरा भक्त इतना नादां कयूँ है ?

-मेजर (डा) शालिनी सिंह

हिंदी दंडित क्यूँ 

सगी हूँ पर सौतेली बन सहती हूँ
अपने घर में ही सकुचाई सी रहती हूँ 

मैं हिंदी हूँ मातृभाषा कहते मुझे

मेरे बच्चे ही पर उपेक्षित करते मुझे

मुझे न बचपन तुतलाता है अब 

चढ़ गयी जुबां पे तो होगा ग़ज़ब 

डर यही मेरे बच्चों को सालता है

कैसे सोचेगी उनकी संतान अंग्रेज़ी में तब

सिखते विदेशी भाषायें बड़े चाव से

दणित कर मुझे देते अनगिनत घाव से

पराई भाषा न जानना, बात लज्जा की है

मुझे न पहचानने में पर शान छिपी है

मेरे घर के कुछ कोनों को है मुझसे घृणा भी

तिरस्कार कर मेरा करते हैं विरोध भी

मैं देश का गौरव हूँ मैं विकास की रेखा हूँ

यह कोरी बातें हैं इक दिवस को सजाती हैं

इक दिन सम्मान दे अनादर करते वर्ष भर मेरा

माँ हूँ सब जानती हूँ पर फिर भी बहल जाती हूँ

स्नेह आदर समेट कर तुम्हारा आँचल में

नज़रों से तुम्हारी फिर ओझल हो जाती हूँ 

-मेजर (डा) शालिनी सिंह

#हिंदीदिवस

#१४सितंबर

मुलाक़ात 

लफज लफज निचोड़ रूह से बाहर किया था
कमबख़्त एक नज़र में फिर कलाम लिख गया

शिकवों की गठरी थाम कर रहे थे सफर
मुस्करा के हर सवाल वह ख़ारिज कर गया

दर्द मिले या मिले जखम अब कोई नया
गले लगा वह एक नया वादा कर गया

सही ग़लत का अब कौन करे यहाँ फ़ैसला
दिल मेरा ही है जो फिर बग़ावत कर गया

इंतजार ख़त्म होने को ही था बस मेरा
अगली मुलाकात का पर वह ज़िक्र कर गया