क़सम 

ज़िंदगी की तलाश में निकले थे जिस राह पे

उसी से लौटे लब पे मौत की दुआ लिए हुए

मेरा हक़ भी वाजिब था और सवाल भी

सच की जगह ज़हर दिया जवाब में

जफ़ा के हाथो वह कितना मजबूर था

किस बात से ख़फ़ा ज़्यादा हो तुम

मेरे सवाल पे या मेरे सिर पे हाथ रख

झूठी क़सम खा के दिये अपने जवाब से

शायद उसकी झूठी क़सम में कहीं

थोड़ा सच भी शामिल था

या फिर मौत के फ़रिश्ते भी 

बेवफ़ा थे मेरे यार की तरह

मुझे छुकर अपने वादे से मुकर गये

  

Advertisements

हक़ीक़त

दोस्तों के इसरार पे 

दवात मैंने बदल डाली

अश्क़ों की स्याही उड़ेल 

मुस्कराहट क़लम मे डाली

कोरे पन्नों पे लिखने बैठी 

ख़ुशी भरे अफ़साने

पर क्या करूँ –

अल्फ़ाज़ बग़ावत कर बैठे

कहने लगे कानों में मेरे

मुसकान यूँ ही पहने रहो

तुम उदास लबों पे ताकि

जहाँ मे ख़ुशियों का कारोबार चले

पर जब उतारो हमें काग़ज़ पर

अफ़साना नहीं हक़ीक़त कहने दो
– शालिनी