पश्मीना 

तेरे फ़रेब का पश्मीना ओढ़ 

चल पड़ी थी मैं 

कुहासों की राह को 

 मोहब्बत की मँजिल समझ……..

तेरी बेपरवाई के चाख से गुज़र रही 

सर्द हवाएों में ठिठुर रही है

भीगी रूह की ज़मीन मेरी

धुँधले ख़्वाबों का पशेमान आसमान ….

पुकार लो तुम एक बार नाम मेरा

तेरी आवाज की चिंगारी से

सुलग जाये शायद बुझा जखम कोई

तेरी यादों की गरमी कुछ कम हो चली है…..

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