हाँ

हाँ
उड़ना चाहती हूँ मैं भी

उस परवाज पे जो मेरी हो

खिड़की से ताकते टुकड़े को

तुम मेरा आसमान न कहो

हाँ

चलना चाहती हूँ मैं भी

उस मँजिल की ओर जो मैं चुनूँ

पंरपरा के पद चिन्हों को

तुम मेरी राह न कहो

हाँ

कहना चाहती हूँ मैं भी

शब्द जो बोलें मेरे जज़्बात

अपनी सोच पे मेरी हामी को

तुम मेरी बात न कहो

हाँ

जूझना चाहती हूँ मैं भी

उस संघर्ष में जो निखारे मुझे

घर की चारदीवारी को

तुम मेरी कर्मभूमि न कहो

हाँ

हँसना चाहती हूँ मैं भी

हँसी जो बरसे मेरी आँखों से

होंठों पे खिंचीं फीकी लकीर को

तुम मेरी मुसकान न कहो

हाँ

जीना चाहती हूँ मैं भी

रूह को अपनी कुचले बिना

पीछे चलते रहने को अपने

तुम मेरी ज़िंदगी न कहो

हाँ

लड़ना चाहती हूँ मैं भी

अपने अस्तित्व के लिए तुमसे

मेरे आत्म सम्मान को

तुम मेरा अभिमान न कहो

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एक पाती सैनिक की

गोली खाता हूँ मैं हँसते हँसते अपने सीने पे
लहू बहा देता हूँ अपना तिरंगे की आन पे

रातों जागता हूँ मैं तुम्हारी नींद के ख़ातिर

मौत लगाता हूँ गले तुम्हारी जान के ख़ातिर

बीवी बच्चों से अपने रहता मैं दूर हूँ

माँ-बाप की सेवा करने से मजबूर हूँ

देश सेवा ही काम है मेरा , मैं मानता हूँ

ईमानदारी से करना अपना काम मैं जानता हूँ

दुश्मन को चीर दूँ यह ताक़त मैं रखता हूँ

आदेश तक खामोश रहने का साहस रखता हूँ

मेरे सिर पर पड़ा पतथर देश पर वार है

मेरे गाल पर थप्पड़ आपका अपमान है

मेरी बन्दूक़ की गोली में भी अनुशासन है

यह बिगड़ते हालात आपका कुशासन है

हंस के खा लूगा मैं जली रोटी और बारूद

मेरे नाम पे राजनीति की रोटी सेंकना छोड़ दो

शहादत पे मेरी बेशक चंद आँसू न बहाना

दुश्मन के झंडे मेरी ज़मीन पे फहराना छोड़ दो

जन्नत ???

जन्नत से उतरे चंद रोज़ पहले यह फ़रिश्ते
किसे जन्नत का ख़्वाब दिखा भरमाते हो

मतलब जिनका न समझा न समझाया

कयूँ आयत वह ज़ुबानी रटवाते हो

मोहब्बत का सबक़ सीखता जिनसे ज़माना

उन मासूमों को नफ़रत का पाठ पढ़ाते हो

खुदा बसता है इनकी बेबाक़ हँसी में

बचपन छिन कर ख़ौफ़ जिन्हें सिखाते हो

सवाल न करे तुम्हारे गुनाही मनसूबों पे

तालिम के नाम पे ज़ाहिल इन्हें बनाते हो

सुकून फ़तह कर सकते है यह ज़र्रे आदम के

बाँट इस्लामी-काफ़िर में ख़ून क्यों बहाते हो

जंग है हर इंसान की भीतर छुपे शैतान से

बख़्श खुराफाते इसकी किसे जिहाद बताते हो

कैद कर सोच इनकी,हराम बता इलमो-तालीम

मुनाफिक आसमां में कैसी परवाज़ सिखाते हो

मुहम्मद ने सिखाया सबक़ तुमहे अमन का

हाफिज बन क़त्ल को रजा उसकी बताते हो

किसी मासूम माँ की गोद के नूर-ऐ-नज़र से

कितनी और मासूम माँओं की गोद उजाड़ते हो

अल्लाह को न होगी क़बूल यह नमाजे कभी

उसकी नेमतों को मुजाहिद्दीन बनाते हो

रहमत है खुदा की यह जिदगी ज़मीं पर

जन्नत के सराब से रोज़ दोज़ख़ जिसे बनाते हो