हाँ

हाँ
उड़ना चाहती हूँ मैं भी

उस परवाज पे जो मेरी हो

खिड़की से ताकते टुकड़े को

तुम मेरा आसमान न कहो

हाँ

चलना चाहती हूँ मैं भी

उस मँजिल की ओर जो मैं चुनूँ

पंरपरा के पद चिन्हों को

तुम मेरी राह न कहो

हाँ

कहना चाहती हूँ मैं भी

शब्द जो बोलें मेरे जज़्बात

अपनी सोच पे मेरी हामी को

तुम मेरी बात न कहो

हाँ

जूझना चाहती हूँ मैं भी

उस संघर्ष में जो निखारे मुझे

घर की चारदीवारी को

तुम मेरी कर्मभूमि न कहो

हाँ

हँसना चाहती हूँ मैं भी

हँसी जो बरसे मेरी आँखों से

होंठों पे खिंचीं फीकी लकीर को

तुम मेरी मुसकान न कहो

हाँ

जीना चाहती हूँ मैं भी

रूह को अपनी कुचले बिना

पीछे चलते रहने को अपने

तुम मेरी ज़िंदगी न कहो

हाँ

लड़ना चाहती हूँ मैं भी

अपने अस्तित्व के लिए तुमसे

मेरे आत्म सम्मान को

तुम मेरा अभिमान न कहो

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