शायर की दुआ

मेरी कलम में वह हुनर दे खुदा

काग़ज़ के सीने में दिल धड़क जाये

मेरी स्याही की तासीर कुछ ऐसी हो

दर्द को उकारे और मलहम हो जाये

मेरे लफजों में दे कुछ ऐसा असर

समझे पुतला और इंसान हो जाये

मेरी नज़्मों में शिद्दत हो इस क़दर प्यार की

वाह! वाह! नाखुदा करे और खुदा हो जाये

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ख़बर

अख़बार के पन्ने पलट बहस अब कया कीजिए
यहाँ सोच ग़ुलाम , कलम बिकी सी मालूम होती है

जिसकी जो सोच वैसा न्यूज़ चैनल देखा कीजिए

रिमोट से सच की शक्ल बदली सी मालूम होती है

हर कोई दूसरे के झूठ को चिल्ला कहा कीजिए

ख़ुद की हक़ीक़त खामोश सी मालूम होती है

मंच पे सवाल और जवाब एक साथ शोर कीजिए

ठगी सी जनता कुछ बहरी सी मालूम होती है

हादसे से नये हादसे का सफर तय बस कीजिए

हर ख़बर की उमर कुछ छोटी सी मालूम होती है

# news channels # journalism#Indian journalism

हम बोलते बहुत ज़्यादा
बताते कुछ कम हैं

रिश्ते निभाते बहुत ज़्यादा

उन्हे जीते कुछ कम हैं

हम पढ़ते बहुत ज़्यादा

समझते कुछ कम हैं

उपदेश देते बहुत ज़्यादा

मिसाल बनते कुछ कम हैं

हम धार्मिक बहुत ज़्यादा

धर्म समझते कुछ कम हैं

भगवान से माँगते बहुत ज़्यादा

शुक्रिया करते कुछ कम हैं

हम बाहर ताकते बहुत ज़्यादा

भीतर झाँकते कुछ कम हैं

कल के सपने बुनते बहुत ज़्यादा

आज को समेटते कुछ कम हैं

हम बहस करते बहुत ज़्यादा

मुद्दे समझते कुछ कम हैं

चिंतन करते बहुत ज़्यादा

परवाह करते कुछ कम हैं

हम प्रेम के गीत गाते बहुत ज़्यादा

मोहब्बत गुनगुनाते कुछ कम है

दिलासा देते बहुत ज़्यादा

मरहम लगाते कुछ कम हैं

हम मुस्कुराते बहुत ज़्यादा

हँसते खिलखिलाते कुछ कम हैं

मौत से डरते बहुत ज़्यादा

जिंदगी जीते कुछ कम हैं

उमर फ़ैयाज़ 

शोले धड़के हैं सीने में आग बन बरसने दो
गाथा यह शहादत की मोम बन न पिघलने दो

मशाल जलाओ वीरगति के बदले की 

तैयारी करो क्रूर हत्यारों पे हमले की

हाथों मे शमा जला मौन अब चलो नहीं

आंतकी टोलों के आगे घुटने तुम टेको नहीं

कूच करो उस घाटी पे जहाँ आंतक का जोर है

वतन के ख़िलाफ़ मेरे जहाँ नारों का शोर है

कायर है दिल्ली समझौते को लाचार है

शहादत वीरों की राजनैतिक कारोबार है

इंडिया गेट पे जुटी भीड़ वक़्ती ख़ुमार है

बहरा है राजा, प्रजा सोच से बीमार है 

कितनी निर्भया, कितने फेययाज पे आँसू बहा लिए

दानवों के ताण्डव के आगे शान्ति मार्च निकाल लिए

योद्धा हो तुम शांतिदूत नहीं उठो घाटी पे कूच करो

साथी के सीने की गोली का बारूद से हिसाब करो

बहन के निकाह से अगवा हुआ वह तुम्हारा भी भाई था

कायर दरिंदे ने फिर तुम्हारे लहू को ही ललकारा था

कुशासन के आगे अनुशासन का कोई मोल नहीं

आत्मरक्षा के लिए आदेश की राह अब ताको नहीं

मातृभूमि पे मर मिटना यदि कर्तव्य, धर्म है तुम्हारा 

वर्दी के अपमान का प्रतिकार भी हक है तुम्हारा

छोड़ो यह मोम की बाती यह बातें मौन की

चीर दो छाती जिसमें प्रीत नहीं हिंद की

उम्मीद 

अास ने दिए जो जखम

उम्मीदों के मरहम उन पर लगा रहे हैं

नये ज़ख़्मों को देखो बुला रहें हैं

दर्द के सिलसिले यूँ बढ़ा रहे हैं

ज़ायक़ा 

मेरी आँखों के खारे का सबब

तेरे इशक का तीखापन है

या तेरी मीठी जुबां के झुठ

या फिर कड़वा सच है तेरी बेवफ़ाई का

तेरी मुहबबत के छलावे का सफ़र था

जिसे मँजिल समझ लिया था मैंने

तेरे लिए महज सफ़र था नये ज़ायक़े का

चीड का पेड़ 

गर्व से खड़ा था बग़ीचे में मेरे

चीड का एक पेड़

निरंतर बढ़ता गगन चुमने

कोन गिराता तो बच्चे झूमते

हवा में बिखरती ख़ुशबू उसकी

बहता पहाड़ों का एहसास साँसो मे मेरी

लायी थी बरसो पहले

एक पौधा छोटा सा

सौग़ात पर्वत की

याद जिदगी के हिस्से की

गुज़ारी थी जो किसी शिखर पे

बरसो वह साक्षी खड़ा रहा

जड़ो को फैला नभ की ओर देखता रहा

देखा उसने मुझे टूटते हुये

बिखर के फिर समेटते हुये

मेरे फूल भी खिलते देखे उसने

नन्ही बाँहों ने किलकारीयों से लपेटा उसे

लौटी घर आज तो देखा आरी उसपे

कुछ मज़दूर क्रूरता से चला रहे थे

चढ़ उसकी छाती पे बाँहें उसकी काट रहे थे

लेकर जीवन उसका जीवनी अपनी कमा रहे थे

हरा बिछौना पत्तों का लान में बिछा था

हर एक पत्ता मानो सिसक रहा था

एक अधूरी कहानी कह रहा था

दुख में उसके मैं झुंझला के रह गयी

सुना मेरा बेटा भी उससे लिपट के रोया था

पुन बढ़ जायेगा के झूठे आश्वासन से

उसे नाना-नानी ने मनाया था

क्या था उस चीड का क़सूर ?

सिसक कर मैंने माँ से पूछा

उसके पत्ते पड़ोसी के घर गिरते थे

लोक-चिंतित माँ ने यह अपराध बताया था

स्तब्ध रह गयी मैं इस सोच पे

क्या पत्तों का सहज गिरना दोष था?

शुद्ध हवा, शीतल छाँव , मोहक ख़ुशबू

 क्या इतने गुणों का कोई मोल नहीं था ?

यही ‘सयानापन’ है जिसने पर्यावरण को

ताक पर रख कांकरिट के जंगल लगाये हैं

यही सोच है जिसने हवा में शहर की

न जाने कितने ज़हर मिलाये हैं

बग़ीचे में मेरे एक ठूँठ खड़ा है

गवाही अपने बेक़सूर क़त्ल की

गुज़रते परिंदों को दे रहा है
गर्व से खड़ा था बग़ीचे में मेरे

चीड का एक पेड़……..