क्या भूले क्या याद करे

क्या भूले उसे क्या अब याद करे
ख़्वाब भी वो झूठा ही तो था

क्या कोसे उसे अब क्या कहें ख़ुद से

महुबबत के फरेब में किया गुनाह ही तो था

चाहें भी तो दे कैसे उसे जफ़ा की सजा

टूटा जो दिल वो उसका घर ही तो था

आवाज दी नहीं उसे यूँ तो एक अरसे से

जुबां पर बिखरा जो नाम उसका ही तो था

अजनबी से ज़्यादा दूर है जो शख़्स

कल मुझसे ज़्यादा मेरा ही तो था

मेरी मौत पे न बहा सका वो दो आँसू

मेरे साथ जान देने का क़ौल मज़ाक़ ही तो था

हमेशा की मियाद उसने बता दी

साथ दूँगा ‘हमेशा ‘ यह कहा ही तो था

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