उमर फ़ैयाज़ 

शोले धड़के हैं सीने में आग बन बरसने दो
गाथा यह शहादत की मोम बन न पिघलने दो

मशाल जलाओ वीरगति के बदले की 

तैयारी करो क्रूर हत्यारों पे हमले की

हाथों मे शमा जला मौन अब चलो नहीं

आंतकी टोलों के आगे घुटने तुम टेको नहीं

कूच करो उस घाटी पे जहाँ आंतक का जोर है

वतन के ख़िलाफ़ मेरे जहाँ नारों का शोर है

कायर है दिल्ली समझौते को लाचार है

शहादत वीरों की राजनैतिक कारोबार है

इंडिया गेट पे जुटी भीड़ वक़्ती ख़ुमार है

बहरा है राजा, प्रजा सोच से बीमार है 

कितनी निर्भया, कितने फेययाज पे आँसू बहा लिए

दानवों के ताण्डव के आगे शान्ति मार्च निकाल लिए

योद्धा हो तुम शांतिदूत नहीं उठो घाटी पे कूच करो

साथी के सीने की गोली का बारूद से हिसाब करो

बहन के निकाह से अगवा हुआ वह तुम्हारा भी भाई था

कायर दरिंदे ने फिर तुम्हारे लहू को ही ललकारा था

कुशासन के आगे अनुशासन का कोई मोल नहीं

आत्मरक्षा के लिए आदेश की राह अब ताको नहीं

मातृभूमि पे मर मिटना यदि कर्तव्य, धर्म है तुम्हारा 

वर्दी के अपमान का प्रतिकार भी हक है तुम्हारा

छोड़ो यह मोम की बाती यह बातें मौन की

चीर दो छाती जिसमें प्रीत नहीं हिंद की

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