कैसे कह दूँ

माना बरसो से तुम साथ हो मेरे
न मेरी राहों पे तुम्हारे क़दमों के निशाँ हैं

न मेरी मँजिलों का पता है तुम्हें

कैसे कह दूँ जान! मैं हमसफर तुम्हें

माना बरसों से रखते हो तुम ख़याल मेरा

न मेरे जज़्बातों की है ख़बर तुम्हें

न मेरे लफजों की है क़दर तुम्हें

कैसे कह दूँ जान !मैं हमनवां तुम्हें

माना बरसो से रिश्ता है तुम्हारा मेरा

न मेरी मुस्कराहट में खिलखिलाते हो

न मेरे अश्क़ अपने काँधे पे सजाते हो

कैसे कह दूँ जान! मैं हमनशीन तुम्हें

माना बरसों से मुझमें बसा घर है तुम्हारा

न मेरी दिवारों पे यादें सजाते हो

न मेरे आँगन में रजनीगंधा महकाते हो

कैसे कह दूँ जान! मैं हमनफस तुम्हें

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   नहीं चाहती

                       
नहीं चाहती कि मेरी मेहफूजगी की ख़ातिर
             तुम्हारे क़दम आगे हो और मेरे पीछे

मुश्किल रास्तों पे तुम्हारे हमकदम चल सकती हूँ मैं

              साथ तुम्हारे हर मुश्किल से लड़ सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि मेरी हिफ़ाज़त की ख़ातिर

               अपना कोट उतार के पहना दो मुझे

सर्दी को एक कोट में तुमसे आधा बाँट सकती हूँ मैं

               साथ तुम्हारे हर मौसम को जी सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि मेरे आराम की ख़ातिर

         बोझ भारी तुम अपने काँधो पे उठा लो

तुम्हारे हर भार को आधा बाँट सकती हूँ मैं

       साथ तुम्हारे हर बोझ को हल्का कर सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि मेरी ज़िम्मेदारी उठाने की ख़ातिर

          बुरे वक़्त में तुम मेरी ढाल बनो

 तुम्हारे हाथ की शमशीर बन सकती हूँ मैं

          साथ तुम्हारे हर दुश्मन से लड़ सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि मेरी सलामती की ख़ातिर

       मुझे घर में कैद कर पासबान तुम बन जाओ

तुम्हारी ग़ैरमौजूदगी में भी तुम्हारी बन रह सकती हूँ मैं

       साथ हो न हो तुम, बुरी नज़र पढ़ सँभल सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि तुमसे मदद पाने की ख़ातिर

        नज़र नीची रख मैं छुई मुई सी ख़ुद को जताउँ

तुमसे कमतर बन कर मैं तुम्हारी अना बहलाऊँ

    साथ मुक़ाबला नहीं तुम्हारे, पर बराबर बन सकती हूँ मैं

नहीं चाहती कि रोमांस के ख़ुशगवार एहसास के ख़ातिर

         चंद रोज़ तुम मेरी ज़ुल्फ़ सँवारो, महुबबत गुनगुनाओ

मेरे लिए चंद दरवाज़े खोलो कुछ कुर्सी सरकाओ

        साथ दो उमर भर हमसफर बना बस यही चाहती हूँ मैं

-शालिनी सिंह

सड़क का गुंडा 

निर्भया का बलात्कारी लगता ‘मासूम’ है

तेज़ाब से जला दे ‘ना’ को वह ‘मर्द  ‘ है

बेटी पे कसता फबतियाँ वह ‘रोमियो’ है

पत्नी का हत्यारा पति भी रहता ‘निर्दोष’ है

पतथर फेंके वर्दी पे वह ‘हमवतन’  है

भड़का कर दंगा भी कोई ‘हमदर्द’ है

आग लगा दे शहर को वह ‘मजबूर’ है

लूटकर ख़ज़ाना कहलाता ‘बेक़सूर’ है

शंका पर करे हाहाकार वह ‘गौरक्षक’ है

नफ़रत का दे सबक़ फिर भी ‘राम भक्त ‘ है

दौलत लूटा बदलवाये धर्म वह ‘पादरी’ है

बेतुके फ़तवे सुनाये कहलाता पर ‘मौलवी’ है

झंडे फहराये दुश्मन के वह ‘विद्यार्थी’ है

नक्सलियों की पीठ ठोकें वह ‘बुद्धिजीवी’ है

नशे में रौंद दे ग़रीबों को वह ‘चहेता सितारा’ है

रिहा करा दे क़ातिल को यह ‘पेशेवर वक़ील’ है

क़त्ल कर दे इंसानियत वह ‘जिहादी’ है

प्रहार करे देश पे वह ‘प्यारा पड़ोसी ‘ है

गाली देना देश को ‘वैचारिक अभिव्यक्ती ‘ है

सच की तस्वीर  बदलना ‘स्वतंत्रता प्रेस’ की है

जनता को गुमराह करना सिर्फ़ ‘राजनीति’ है

भ्रष्टाचार का दलदल कहलाती ‘नौकरशाही’ है

बस………

तिरंगे में लिपटा घर आया वह एक ‘मामूली सिपाही’ है

‘सड़क के गुण्डे ‘ की उपाधि रक्षको के सरगने ने पायी है

सोचती हूँ

सोचती हूँ 

कितने में बिकी होगी वह कलम

जिसने एक ही स्याही से रंग दिया

एक क़ातिल को, एक रक्षक को

सोचती हूँ 

कितने में बिका होगा वह ज़मीर

जिसने न देखने दिया फ़र्क़ नज़रों को

जलियाँ के मासूमों में , घाटी के पत्थरबाज़ों में

सोचती हूँ

कितनी सजा काफ़ी होगी उसके लिए

जिसने शब्द दिए दुश्मन के इरादों को

झूठला सच अपना, सच बता झूठ उसका