सड़क का गुंडा 

निर्भया का बलात्कारी लगता ‘मासूम’ है

तेज़ाब से जला दे ‘ना’ को वह ‘मर्द  ‘ है

बेटी पे कसता फबतियाँ वह ‘रोमियो’ है

पत्नी का हत्यारा पति भी रहता ‘निर्दोष’ है

पतथर फेंके वर्दी पे वह ‘हमवतन’  है

भड़का कर दंगा भी कोई ‘हमदर्द’ है

आग लगा दे शहर को वह ‘मजबूर’ है

लूटकर ख़ज़ाना कहलाता ‘बेक़सूर’ है

शंका पर करे हाहाकार वह ‘गौरक्षक’ है

नफ़रत का दे सबक़ फिर भी ‘राम भक्त ‘ है

दौलत लूटा बदलवाये धर्म वह ‘पादरी’ है

बेतुके फ़तवे सुनाये कहलाता पर ‘मौलवी’ है

झंडे फहराये दुश्मन के वह ‘विद्यार्थी’ है

नक्सलियों की पीठ ठोकें वह ‘बुद्धिजीवी’ है

नशे में रौंद दे ग़रीबों को वह ‘चहेता सितारा’ है

रिहा करा दे क़ातिल को यह ‘पेशेवर वक़ील’ है

क़त्ल कर दे इंसानियत वह ‘जिहादी’ है

प्रहार करे देश पे वह ‘प्यारा पड़ोसी ‘ है

गाली देना देश को ‘वैचारिक अभिव्यक्ती ‘ है

सच की तस्वीर  बदलना ‘स्वतंत्रता प्रेस’ की है

जनता को गुमराह करना सिर्फ़ ‘राजनीति’ है

भ्रष्टाचार का दलदल कहलाती ‘नौकरशाही’ है

बस………

तिरंगे में लिपटा घर आया वह एक ‘मामूली सिपाही’ है

‘सड़क के गुण्डे ‘ की उपाधि रक्षको के सरगने ने पायी है

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