ख़ाक 

फड़फड़ा रहे थे खूब अलग होने को दरख़्तों से
एक ही उड़ान में मिल गये वे पत्ते ख़ाक में

हवा का क्या है , यूँ ही बहका कर बदल जाती है

समझ आता है यह फरेब , मिल कर ख़ाक में 

दरख़्त का वजूद पत्तों से न था कभी 

जड़े फैली है बहुत भीतर इसकी ख़ाक मे

साँस के क़ाफ़िले पे तय करता रहा मुसाफ़िर यह सफर

ख़ाक से बिस्मिल्ला कर थमा फिर ख़ाक में 

लिपटी है पैरों मे तो इसे कमतर न समझ लेना

कल के पहाड़ बिखरे पड़े है आज की ख़ाक में

माथे पे अपने चूम कर यह ख़ाक सजा लो

शहीदों के ख़ून की महक है वतन की ख़ाक में

कहने लगे न खोलिये परतें ,अजी तौबा अब कीजिये 

दबा दिजिए कुछ शिकवे कुछ राज अाप ख़ाक में
-मेजर (डा) शालिनी सिंह

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जो नहीं है

जो नहीं है जिसके पास

उसे वही यहाँ बाँटते देखा

नफ़रत से भरे हैं जो

प्यार का सबक़ उन्हे बाँचते देखा

बच्चे की भूख न दिखी जिन्हें 

पतथर को दूध उन्हे पिलाते देखा

इंसान का ख़ून बहाके यहाँ 

खुदा को अजान लगाते देखा 

हवस का शिकार करके नारी का

शील का सबक़ उसे सिखाते देखा

उपेक्षित कर तमाम उमर उसके जज़्बात 

अर्द्धांगिनी उसे फिर बताते देखा

बचपन सयाना कर बोझ से

मासूमियत बच्चों में ढूँढते देखा

पहुँच न सके जिस मँजिल पे कभी

संतान को उसी राह पे धकेलते देखा

धर न पाये जिन मूल्यों को जीवन मे कभी

नयी पीढ़ी को गुण वही फिर समझाते देखा

घोल के जहर तमाम फ़िज़ा में

फ़िकर जहाँ की फिर करते 

बिखरे काग़ज़ पे कूँचियाँ ,कलर ट्यूब 

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे 

मेरे बच्चों ने खयालों को अपने कुछ रंगो से भरा है

चादर की सिलवटों पे औंधे पड़े तकिये

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे

मेरे बच्चों ने रात को अपने कुछ ख़्वाबों से छुआ है

बेतरतीब रखी किताबों से झाँकते बुकमार्क 

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते है यह मुझसे

मेरे बच्चों ने दुनिया को अपने कुछ सवालों से टटोला है

पसीने से भीगे कपड़े , गर्द मे लिपटे जूते

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते है यह मुझसे 

मेरे बच्चों ने माटी को अपने कुछ खेलों से छुआ है

दिवार से टिका गिटार, कोने में रखा पयानो

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे

मेरे बच्चों ने हवा को अपने कुछ सुरों से सुना है

छेदों से भरे यहाँ वहाँ से झाँकते टारगेट पेपर

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे

मेरे बच्चों नें ध्यान से अपने कुछ लक्ष्यों को भेदा है

मर्तबान के अधखुले ढक्कन , झूठे बर्तन 

अच्छे लगते हैं मुझे

कहते हैं यह मुझसे

मेरे बच्चों ने भूख को अपने कुछ स्वाद से चखा है

बिखरा घर, खुल-बंद का शोर करते दरवाज़े 

अच्छे लगते है मुझे

कहते है यह मुझसे

मेरे बच्चों ने जीवन को अपने कुछ अंदाज से जिया है

एक दिन न शोर होगा न फैला सामान होगा

अच्छा लगेगा मुझे तब भी

कहेगा मौन घर तब मुझसे 

मेरे बच्चों ने आसमां को अपने कुछ हौसलों की परवाज़ से चूमा है

समेट लूँगी यह सामान घर की ख़ामोशी में

सजा दूँगी दिवारों को यादों से

पर तब तक यूँ ही उथल पथल सी रहने दो

मेरे बच्चों का बचपन यूँ फैला सा अच्छा लगता है मुझे

आज का सच

कभी साड़ी से धर्म टूटता

कभी स्कर्ट से लूटती सभ्यता 

नारी के कपड़ों में लिपटी है

हाय! मेरे समाज की संकीर्णता 

कहीं केसरिया कोसा जाता 

कहीं हरे का होता अपमान

रंगो में देखो बँट गयी है

हाय! मेरे देशवासियों की पहचान

कभी शुकर से अपमानित होती क़ुरान 

कभी गौरक्षा हेतु क़त्ल होते इंसान

मासूम पशुओं के माथे मढ़ दिये

हाय! मेरे क़ातिलों ने इलजाम

कहीं रात भर जगाये जागरण

कहीं सुबह की नींद उड़ाये अजान

दिन रात शोर से भर दिये

हाय! कितने बहरे हुये मेरे भगवान 

अल्लाह ईश्वर या भगवान

सुनो ! जिस नाम से भी तुम सुनते हो

तुम्हारी रक्षा करते करते 

हाय! राक्षस बन गया यहाँ इंसान 

यूँ तो 

यूँ तो तेरे बिन भी मुकम्मल हूँ मैं

यूँ तो मेरी भी तुझे ज़रूरत नहीं

पर कहता है आज भी कमबख़्त दिल

‘हम’ में जो बात थी

वह न तुझ में है और न मुझ में

यूँ तो मंजिले है मेरी तुझसे जुदा भी

यूँ तो हमसफ़र है तेरे मेरे सिवा भी

पर कहती हैं आज भी कमबख़्त राहें

सफर मे जिदगी थी

जब ‘हम’ साथ चले थे

यूँ तो इनकार है मेरे लबों पे

यूँ तो खामोश तेरी जुँबा भी है

पर कहती है आज भी कमबख़्त नज़र 

क़िस्मत मे लिखा इशक था

तभी ‘हम’ मिले थे