तीन तलाक़ 

एक लफज तीन चोट कर
तोड़ नहीं सकता लम्हे में आशियाँ

तीन बार क़बूल कर बरसों बसाया था जिसे

-मेजर(डा) शालिनी सिंह

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बेहिसाब

बहुत से ज़्यादा ही मिलती है सजा 

इशक की जो होता है बेहिसाब

न अश्क़ का सैलाब कोई गिनता है

न हसरतों की बेचैनी का रखता हिसाब 

– मेजर (डा) शालिनी सिंह

कुछ यूँ

मसले कुछ यूँ भी उलझते रहे
ग़लती मानी नहीं कभी

…….माफ़ी माँगते रहे

नादानी हम कुछ यूँ भी करते रहे

सुधरे वो नहीं कभी

………….माफ़ उन्हें करते रहे

ज़ुल्म ख़ुद पे कुछ यूँ भी करते रहे

जखम भरे नहीं कभी

…………..चाख रफ़ू करते रहे

ख़ामोशी की दीवार कुछ यूँ बनती रही

आवाज़ दी नहीं कभी

…………..बात उनसे करते रहे

मँजिल हासिल कुछ यूँ न हुयी

क़दम बढ़ाया नहीं कभी

……………फ़ासले तकते रहे

-मेजर (डा) शालिनी सिंह

पहचान

शायर ने कुछ यूँ की महफ़िल में लोगों की पहचान

उसके नग़मों की नमी आँखों में हमदर्दो के थी
दाद दे हौसला अफ़्जाई कर रहे थे हुनर के क़द्रदान
जो गम के बयां पे मुस्करा रहे थे वह दुश्मन थे 
चुप थे जज़्बातों से जाहिल या पतथर के इंसान
-मेजर ( डा) शालिनी सिंह

कैसे लोग हैं ये ?

‘सच्चा सौदा’ के नाम पे धंधा ही तो किया है
गुंडों ने बलात्कारी को अपना बाबा कहा है

न्याय रोकने के लिये देश से अन्याय किया है

गुरू के नाम पे प्रदेश का बलात्कार किया है

यह कैसे अंधभक्त है यह किसके भक्त हैं ?

धर्म गुरू के नाम पे ये विषेले सर्प हैं

भक्त बना बढ़ाते अपना विष हैं

हर तरह से समाज को डसते हैं

करते यह धर्म का भी बलात्कार हैं

यह कैसे धर्म गुरू हैं यह किसके गुरू हैं ?

सरकार के नाम पे यह निंपुसक राजनेता हैं 

वोट के लिये सींचते जहर की बेल हैं

देश को लगा कर आग सेंकते हाथ हैं

क़ातिलों को देते राजनैतिक संरक्षण हैं

यह कैसे शातिर नेता हैं यह किसके नेता हैं ?

-मेजर (डा) शालिनी सिंह

फ़र्क़ 

फ़र्क़ यही है तुम्हारी नजम
और मेरी शायरी में

तुम कारीगर लफजों के हो

मैं लिखती जज़्बात हूँ 

तुम देते हो हसीन भुलावे

मैं उकेरती हूँ दबे जखम कई

तुम दिखाते हो ख़्वाब रंगीन

मैं जगा देती हूँ नींद से ही

तुमने सीखा किताबों से

तजुरबों से सबक पाया मैंने

तुम ताकते रस्तो की ओर

मंजिल पीछे छोड़ आयी मैं 

शौक़ से सजाये तुमने

क़ाफ़िया अपने शेरों के

बेतरतीबी से उड़ेले मैंने

दर्द अपने और करीबों के

तुम लिखते मुहब्बत के नग़मे 

मैं लिखती मुहब्बत बन

तुम करते जिसका आग़ाज़ हो

मैं उस सफर का अंजाम हूँ

तुम वाह बन फिसल जातें ज़हन से

मैं टीस बन ठहर जाती दिल में

तुम सुनाई देते नग़मों में

मैं खामोश बहती अश्क़ों में

तुम लिखते सलीक़े से

मैं लिखती काँच के करीचों से

तुम्हारी कलम में स्याही है

मैंने स्याही की जगह हैं अंगार भरे

तुम तलाशते खुशी फरेबी मुसकान में

मैंने दर्द को खुबसुरत बनाया है

तुम गिनते लहरें किनारे से

मैंने डूब कर समुन्दर पाया है

फ़र्क़ यही है तुम्हारी नजम

और मेरी शायरी में

तुम कारीगर लफजों के हो

मैं लिखती जज़्बात हूँ 

-मेजर (डा) शालिनी सिंह