जीत रावण की

फिर जल जायेगा पुतला आज 
रावण भीतर पर बच जायेगा

चोला पहन राम नाम का

फिर सीता कोई हर जायेगा

रावण माना अभिमानी था

फिर भी संयमी ज्ञानी था

हर ले गया सीता को पर

शील पे नज़र न डाली थी

आज घर घर में दानव हैं 

न राम हैं ये न ही रावण हैं

अपनी बेटियों को ही लूट रहे

इंसान अब ऐसा दुष्ट प्राणी हैं

हर साल पुतला जलता जब

रावण अट्टहास है करता तब

राम एक ही बार जीता मुझसे

मेरी विजय रोज होती उस पर

-मेजर (डा) शालिनी सिंह

Advertisements

ज़िंदगी की किताब

एक मुझमें न जाने कितने मैं हैं

एक तुझमें न जाने कितने मैं हैं
मेरा कौन सा मैं तेरे किस मैं से

कैसे मिलता है गले या

कैसे उलझ सा जाता है

इसका हिसाब लिखा है

रिश्तों के पन्नों पे …

कुछ पन्नों पे सिलन है अश्क़ों की

कुछ में लिपटी महक मुहब्बत की

तुम्हारे उन रजनीगंधा सी ….

बार बार के शिकवों से मुड़े हैं

कुछ पन्नों के कोने 

कुछ पे दिखते लफ़्ज़ धुँधले

यादें बिसरे लमहों की ….

कुछ पन्नों पे बिखरी 

पशेमानी की स्याही है

कुछ को पलटो तो खनकती 

गूँज हँसी ठिठोली की 

कुछ पे लिखे हैं ख़त

 मैंने वो तेरे इंतज़ार में

कुछ पे फ़ेहरिस्त है तेरे

वादों की ,मेरी ताकीदों की

महफ़ूज़ हैं पन्नों में कुछ

ख़्वाब मुकम्मल भी

कुछ ख़्वाहिशें अधूरी सी….

कुछ पन्नों पे दर्ज है

पता उन मंज़िलों का

जिन तक पहुँचने के रास्ते

कभी मिले नहीं या भटक गये

कुछ पे ज़िक्र है उन सफ़र का

जो ख़ुद हमारी मंज़िल बन गये

इन्हीं पन्नों मे कहीं छिपी हैं 

मुख़्तसर मुलाक़ातें रूह की

जिनके दरमियाँ न जाने कितने

पन्नों से झाँकती कसक है

तन्हाई मे लिपटी जुदाई की

कुछ पन्नों पे लिखे सवाल

ख़ामोश तकते हैं रास्ता

तेरे अधूरे जवाबों के 

मुकम्मल होने का ….

मसरूफ लमहों की आड़ में

हम कितने बेपरवाह हो गये

छुट गये कितने अफसाने

कुछ पन्ने कोरें ही रह गए

आअो इन तमाम पन्नों को समेट 

रख देते हैं यादों की किताब में

कुछ रेशमी, कुछ खुरदरी सी

 जिल्द चढ़ा देते हैं इसपे

हम ‘ज़िंदगी ‘ के नाम की

फ़ुरसत की चाँदनी में 

तजुरबे के चश्मे पहन

बाँचेंगे ज़िंदगी की इस 

किताब को एक दिन

मैं और तुम ….

मेजर (डा) शालिनी सिंह

इक लहर

इक लहर सी मैं
तुमहारे खारेपन से घबराकर

छिटक जाती हूँ 

पत्थरीले किनारों की ओर

बार बार

हर बार

इक सागर से तुम

खींच लेते हो वापस मुझे

पुरानी सी कशिश से

अपनी आग़ोश में

बार बार

हर बार

भूल खारापन तुम्हारा

इक नयी प्यास लिये

इक नयी आस संजोये

लौट आती हूँ तुम में

बार बार

हर बार

छोड़ आती हूँ किनारों पे 

यादों के मोती कभी

शिकवों का कचरा कभी

बन जाती हूँ फिर तुम्हारी 

बार बार 

हर बार

-मेजर(डा) शालिनी सिंह

क्यूँ 

शौर्य की गाथा लिखते जो
अपने बाहू के शस्त्र से

उन शूरवीर हाथों मे थमा दी है

कयूँ झाड़ू तुमने?

तुम्हारी रक्षा हेतू जो

हंस कर गँवा देते है जान भी

कचरा अपना उनसे उठवा

कयूँ उड़ा रहे उनका मखौल यूँ ?

‘प्रिंस’ गिरे गड्ढे में या तुम फँसो आपदा में

संकट मोचन बन वही तुम्हें उबारते

एहसानों के उनका क़र्ज़ 

क्या खूब तुम हो उतार रहे ?

वीर हैं वो करमवीर भी

पूरी निष्ठा से करेंगे सम्मान 

वह इस अनादर का भी

पर देशवासियों मेरे तुम कयूँ मौन है?

इस अन्याय के ख़िलाफ़ शोर कयूँ नही मचा रहे?

अपनी ज़िम्मेदारी से हो मुँह कयूँ चुरा रहे?

चलो उठो! यह संकल्प करो

अपनी फैलायी गंदगी तुम ख़ुद साफ़ करो

देश के दुशमन का सफ़ाया करते हैं जो

काम यह महान उन्हे इज़्ज़त से करने दो

-मेजर (डा) शालिनी सिंह 

आज़ाद 

तुमने जो जिस्म पे मेरे दिया
हर जखम भर के कवच मेरा बन गया

टुटी हड्डियाँ जुड़ी जब मेरी
मन कुछ और मेरा तब तन गया

हर नील जिससे सजाया था तुमने मुझे
देखो फीका पड़ ठोस मुझे कर गया

आँसू का हर क़तरा बहा जो आँख से
सुख कर वह खारा मुझे कर गया

रूह पे पड़े घाव हरे हैं अभी
वक़्त मरहम लगायेगा इन पे भी कभी

भूल कर भी अब मुझे तुम न छुना
छोड़ घर तुम्हारा नया आसमां मैंने चुना

आजाद हूँ मैं तुम्हारे हर शोषण से
ख़त्म मैंने रोज की जंग को किया
-मेजर (डा) शालिनी सिंह
Inspired by and dedicated to a special friend who survived domestic violence and became a truly empowered woman!

शाख़ से गिरे पत्ते 

शाख़ से गिरे पत्तों पर
क़दम रखना संभाल के

हरी छाँव का सहारा दिया था

चिलचिलाती धूप में कभी

लड़खड़ाते क़दमों के

पीछे चलना इत्मिनान से

गोद में इनके घूमते थे

पैरों से चल न पाते थे कभी

मंद आवाज को इनकी

हौले हौले ही समझना

इशारे तुम्हारे समझते थे

जुबा से न बोल पाते थे कभी

धूमिल आँखों में पढ़ना

तजुरबा जिंदगी का

वक़्त लिख रहा था इनकी किताब

हर्फ़ भी न थे तुम कभी

रिश्तों को तौलना पर

बीते कल की कसौटी पे

कल काम आये थे बहुत

तुमहे इनकी ज़रूरत थी कभी

-मेजर (डा) शालिनी सिंह

कुछ यूँ

बरसों का भरोसा पल में गुनाह हुआ 

मेरा महुबबत पे ग़ुरूर कुछ यूँ कम हुआ

हवा भी शर्मिंदा थी चिराग़ों को बुझाकर

अंधेरों का आंतक कुछ यूँ सरेआम हुआ

 हाथो में छिपा पिंजरा देता आज़ादी की दुहाई

सैयाद के हाथ पंछी कुछ यूँ कैद हुआ

अश्क़ पीते पीते समुंदर हम बन गये

जिंदगी में हादसा कुछ यूँ गहरा हुआ

दरखत पे आरी चलाई कड़ी धूप मे उसने

हरी छाँव में कातिल कुछ यूँ चुस्त हुआ

करवटें बदलते रहे हम नींद से रूठकर

ख़्वाबों में उनसे मिलना कुछ यूँ बंद हुआ

मोहब्बत भूला नहीं और नफरत कर बैठा

इशक में उसके है दिल मेरा कुछ यूँ उलझा हुआ

चीख़ती रही रूह पर ज़रा न आवाज हुयी

मेरे लबों पे तेरा नाम कुछ यूँ खामोश हुआ

मायूसी पे लगाते रहे नयी उम्मीद का मलहम 

जिंदगी मे दर्द का काँरवा कुछ यूँ तैयार हुआ

उसकी यादें लिख जाती हैं जखम कोई 

शायरों में मेरा नाम कुछ यूँ शुमार हुआ

-मेजर (डा) शालिनी सिंह