क्यूँ 

शौर्य की गाथा लिखते जो
अपने बाहू के शस्त्र से

उन शूरवीर हाथों मे थमा दी है

कयूँ झाड़ू तुमने?

तुम्हारी रक्षा हेतू जो

हंस कर गँवा देते है जान भी

कचरा अपना उनसे उठवा

कयूँ उड़ा रहे उनका मखौल यूँ ?

‘प्रिंस’ गिरे गड्ढे में या तुम फँसो आपदा में

संकट मोचन बन वही तुम्हें उबारते

एहसानों के उनका क़र्ज़ 

क्या खूब तुम हो उतार रहे ?

वीर हैं वो करमवीर भी

पूरी निष्ठा से करेंगे सम्मान 

वह इस अनादर का भी

पर देशवासियों मेरे तुम कयूँ मौन है?

इस अन्याय के ख़िलाफ़ शोर कयूँ नही मचा रहे?

अपनी ज़िम्मेदारी से हो मुँह कयूँ चुरा रहे?

चलो उठो! यह संकल्प करो

अपनी फैलायी गंदगी तुम ख़ुद साफ़ करो

देश के दुशमन का सफ़ाया करते हैं जो

काम यह महान उन्हे इज़्ज़त से करने दो

-मेजर (डा) शालिनी सिंह 

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