ज़हरीली हवा

इंसान सी औलाद पा कर
पशेमान है क़ुदरत का आँचल 

हैरान है इस नादाँ की शैतानी पे

नाराज़ है इस कमज़र्फ की मनमानी पे

जिस हवा नें साँसें बख़्शी इसे

उस में घोल रहा रोज जहर नये

जिस माँ की गोद में पल बड़ा हुआ

उसके क़त्ल की करता रोज साज़िश नयी

माँ अफ़सोस के आँसू तब रोती है

आँचल में अपने सिर्फ़ जहर जब देखती है

इक इंसान की नादानी की सजा

मजबूर माँ तमाम मासूमों को देती है

Advertisements